एक दिन किसी ने एक अबला से पूछा
तुम जो घर की लक्ष्मी कहलाती हो
अरे इतना सम्मान ! कैसे पाती हो
अबला आँखों में भर के आँसू
कुछ यू बोली घबराई सी
यह नाम मैंने यूँ ही नहीं पाया
इसके लिए मैंने अपना सर्वस्व गँवाया
हर रात, हर दिन को मैंने
घर की सेवा मैं लगाया
माँ - बाप ने मजबूर हो कर मेरे
अपनी मेहनत की पाई - पाई को
मेरे विवाह में लगाया
ढेर सारा दहेज लेकर
जब मैं इस घर में आई
तभी तो में इस घर की लक्ष्मी कहलाई
मेरी एक सहेली जो दहेज ना ला पाई
वो तो घर की लक्ष्मी न कहला पाई
अगले दिन समाचार पत्र में
उसके जलकर मरने की खबर
एक अखबार में आई
तुम जो घर की लक्ष्मी कहलाती हो
अरे इतना सम्मान ! कैसे पाती हो
अबला आँखों में भर के आँसू
कुछ यू बोली घबराई सी
यह नाम मैंने यूँ ही नहीं पाया
इसके लिए मैंने अपना सर्वस्व गँवाया
हर रात, हर दिन को मैंने
घर की सेवा मैं लगाया
माँ - बाप ने मजबूर हो कर मेरे
अपनी मेहनत की पाई - पाई को
मेरे विवाह में लगाया
ढेर सारा दहेज लेकर
जब मैं इस घर में आई
तभी तो में इस घर की लक्ष्मी कहलाई
मेरी एक सहेली जो दहेज ना ला पाई
वो तो घर की लक्ष्मी न कहला पाई
अगले दिन समाचार पत्र में
उसके जलकर मरने की खबर
एक अखबार में आई
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