Tuesday, July 14, 2015

कुछ कहना है तुमको

कुछ कहना है तुमको जिदंगी ,
क्या सुन पाओगी तुम ?

बड़ी ही निराली हो तुम
कितने ही रंग है तुम्हारे
कभी धूप हो कभी छाँव हो ,
कभी सुबह हो कभी साँझ हो ।

कुछ कहना है तुमको जिदंगी ,
क्या सुन पाओगी तुम ?

कभी खुशियाँ भर के लाती हो ,
फिर गम भी संग दे जाती हो ।
कभी नूर तो कभी बेनूर हो ,
इतनी जल्दी क्यों बदल जाती हो तुम ?

कुछ कहना है तुमको जिदंगी ,
क्या सुन पाओगी तुम ?

मेरी ज़रा भी समझ ना आई तुम ,
हर पल नया गम लाई तुम ,
समझ ही नहीं पाई तुमको ।
प्यार करूँ या लड़ूँ मैं तुमसे ?

कुछ कहना है तुमको जिदंगी ,
क्या सुन पाओगी तुम ?

मेरा दर्द

दर्द मेरा जब ,
मेरे जीने की वजह बन गया ,
यही दिल की राहत और
यही मेरा मुकद्दर बन गया।

खुशी तो धोखा थी ,
आई और चली गई ।
कुछ सपने दिखाकर मुझको ,
जाने कब रुस्वा हो गई ।
गम ही रहा मेरे पास ,
जो हमदर्द मेरा बन गया ।

दर्द मेरा जब ,
मेरे जीने की वजह बन गया ,
यही दिल की राहत और
यही मेरा मुकद्दर बन गया।

अच्छा हुआ कोई आस नहीं ,
कोई नया विश्वास नहीं ,
कोई आएगा लेकर खुशियाँ यहाँ
उस पल का भी तो इंज़ार कहाँ ।
यह तन्हाई ही मेरा जीवन है ।
यही अब मेरा मुकद्दर बन गया ।

दर्द मेरा जब ,
मेरे जीने की वजह बन गया ,
यही दिल की राहत और
यही मेरा मुकद्दर बन गया।

Sunday, July 5, 2015

थकना मत पथिक !

आशा और निराशा
ही जीवन का आधार,
पर तु थकना मत,
हारना मत , पथिक !
यही है जीवन का सार

हमेशा जीत नहीं है मिलती
काँटें पथ पर होते ही हैं
नहीं कोई सरल राह यहाँ
ठोकर तो लगती ही है

पर तु थकना मत पथिक !

हिमालय सा कर ले तु
अपने दबे इरादों को
मत डर इन हवाओं से
लड़ ले हर हालातों से तु

पर तु थकना मत पथिक !

मिलेगी जीत तुझे गर
तु हिम्मत को नहीं छोड़ेगा
हर चुनौती को तु बढ़ कर
घुटनों पर लाकर तोड़ेगा

पर तु थकना मत पथिक !