Thursday, November 10, 2016

नशे का ज़हर

बेटा अब तू बाहर नहीं जाता ?
न तू हंसता न कुछ खाता
माँ ने एक डाँट लगाई
पर बेटे ने न पालक झपकाई
चला गया उठ कर वहाँ से
देखा न मुड़ कर माँ को
ना ही दिल की बात बताई
इतने में कुछ गिरने की फिर
आवाज़ उसके कमरे से आई
झाग झाग था मुखड़ा उसका
और आँखे थी पथराई
बोला माँ मैं बता नहीं सकता
तेरे सुहाग ने ही मेरी साँसे मिटाई
मेरी न थी कोई गलती माँ
बस पापा के बेचे नशे ने
मेरी जीवन की लौ है बुझाई
मैं न रहूंगा अब जिन्दा माँ
पर पापा को मेरा पैगाम कहना
बंद करदे वो नशे का धंधा
क्योंकि उनकी लगाई इस आग ने ही
तेरे घर की है रौशनी बुझाई 

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