Thursday, November 10, 2016

नशे का ज़हर

बेटा अब तू बाहर नहीं जाता ?
न तू हंसता न कुछ खाता
माँ ने एक डाँट लगाई
पर बेटे ने न पालक झपकाई
चला गया उठ कर वहाँ से
देखा न मुड़ कर माँ को
ना ही दिल की बात बताई
इतने में कुछ गिरने की फिर
आवाज़ उसके कमरे से आई
झाग झाग था मुखड़ा उसका
और आँखे थी पथराई
बोला माँ मैं बता नहीं सकता
तेरे सुहाग ने ही मेरी साँसे मिटाई
मेरी न थी कोई गलती माँ
बस पापा के बेचे नशे ने
मेरी जीवन की लौ है बुझाई
मैं न रहूंगा अब जिन्दा माँ
पर पापा को मेरा पैगाम कहना
बंद करदे वो नशे का धंधा
क्योंकि उनकी लगाई इस आग ने ही
तेरे घर की है रौशनी बुझाई 

Tuesday, November 8, 2016

जीवन खो चला

हाय जीवन खो चला
ढूंढू उसे खा कहाँ कहाँ

वैश्विकरण की आँधी में
चमकते सिक्को की चाँदी में
दिखावे की ओढ़ में
स्वार्थपन के शोर में

हाय जीवन खो चला


खोती बचपन की किलकारी में
लालच की गलियारी में
टूटते रिश्तों की तार में
खोखले जीवन सार में

हाय जीवन खो चला

 अनैतिकता के जाल में
बनावटीपन की खाल में
बेमतलब की शान में
बेशर्मी की खान में


Monday, November 7, 2016

बेटी

बेटी मुझे बनाना राम
जो कर जाए कुल का नाम 

मेरे जन्म पर ना हो उदासी 
सब के चेहरे पर हो मुस्कान 
माँ की परछाई बनू मैं 
पापा को हो मुझपर मान 

बेटी मुझे बनाना राम

ना कोई मुझको पेट में मारे 
दादी भाई सा मुझको चाहे 
मेरा भी जन्मदिन मनाये 
मेरे लिए भी तोहफे लाये 

बेटी मुझे बनाना राम

दो कुल को रोशन कर पाऊ
पढ़ लिख कर नई राह बनाऊ
ना रहूँ मैं किसी पे बोझ 
बस इतना दे देना वरदान 

बेटी मुझे बनाना राम

कल्पना चावला  बन नभ में जाऊ 
हर मुश्किल को पर करूँ मैं 
सीता बन हर धर्म को निभाऊ 
कर पाऊँ सब का सम्मान 

बेटी मुझे बनाना राम

माँ बाप का क़र्ज़ चुकाऊ
उन्हें छोड़ कर कभी ना जाऊ
उनकी जग में शान बढाऊ
कर जाऊ कुछ अच्छे काम 

बेटी मुझे बनाना राम

पापा की परी माँ की दुलारी 
सब की करू मुश्किल आसान 
हर कर्त्तव्य को पूरा करू मैं 
ना हो कोई मुझसे परेशान 

बेटी मुझे बनाना राम

Sunday, November 6, 2016

नेता जी हमारे

एक दिन नेता जी से पूछा मैंने
और कितनी तोंद बढ़ाओगे
देश तो सारा खा ही चुके हो
अब और क्या - क्या खाओगे

नेता जी मंद - मंद मुस्काये , बोले
अभी तो कुछ ख़ास नहीं किया है
१०० पुश्तों के लिए कमाना है

अरे १० पुश्तों का ही जुगाड़ हुआ है अब तक
विदेशों में भी पैसा जमा कराना है
अभी तो सरकारी ज़मीन बेची है
सरकारी आसमां पे भी कब्ज़ा जमाना है

पानी पर ही टैक्स लगाया है अभी तो
अरे सांस पर भी तो लगाना है
देश के किसान ही मरे हैं अब तक
हर गरीब को वहीं तक पहुँचाना है

हर चीज़ बेचनी है देश की  लिए
तभी चैन मुझको आना है
विदेशों से कर्ज़े ले लेकर
अपनी प्राइवेट प्रॉपर्टी को बढ़ाना है

मेरी ही केवल तोंद बढ़ी है अब तक
मेरे हर रिश्तेदार की तोंद को बढ़ाना है
सरकारी खज़ाना खाली करके सारा
बस फिर चिंतामुक्त मुझे हो जाना है

फिर राम नाम में मन लगाना है
फिर राम नाम में मन लगाना है 

Friday, November 4, 2016

घर की लक्ष्मी

एक दिन किसी ने एक अबला से पूछा
तुम  जो घर की लक्ष्मी कहलाती हो
अरे इतना सम्मान ! कैसे पाती हो
अबला आँखों में भर के आँसू
कुछ यू बोली घबराई सी
यह नाम मैंने यूँ ही नहीं पाया
इसके लिए मैंने अपना सर्वस्व गँवाया
हर रात, हर दिन को मैंने
घर की  सेवा मैं लगाया
माँ - बाप ने मजबूर हो कर मेरे
अपनी मेहनत की पाई - पाई को
मेरे विवाह में लगाया
ढेर सारा दहेज लेकर
जब मैं इस घर में आई
तभी तो में इस घर की लक्ष्मी कहलाई
मेरी एक सहेली जो दहेज ना ला पाई
वो तो घर की लक्ष्मी न कहला  पाई
अगले दिन समाचार पत्र में
उसके जलकर मरने की खबर
एक अखबार में आई 

Thursday, November 3, 2016

अन्न दाता किसान

अन्न दाता किसान !
हुआ करता था मैं कभी
पर आज सिर्फ लाचार हूँ
कर्ज़, फर्ज, चिंता में डूबा
हाँ मैं वही किसान हूँ
 
क्या सुनाऊ मैं व्यथा अपनी
किसे दर्द
क्या ईश्वर क्या नेता
हर किसी से निराश हूँ
 हाँ मैं वही अन्न दाता किसान हूँ

कभी बाढ़, कभी सूखे ने
फेरा मेरी मेहनत पर पानी
कभी ब्याज की बड़ी दरों ने
माँगी मेरी क़ुरबानी
बस! असहाय हूँ निराश हूँ

हाँ मैं वही किसान हूँ

एक प्रश्न है मेरा सबसे
भविष्य में क्या खाओगे
अन्नदाता को बचा न सके जब
तो अन्न कहाँ से लाओगे
तो अन्न कहाँ से लाओगे   

Wednesday, November 2, 2016

कवि हूँ मैं

कवि हूँ  मैं
कविता मेरा काम
एहसासों का ताना बाना
बस यही मेरी पहचान

जीवन से जब थक हार जाता हूँ
निराशा के तम में खो जाता हूँ
इस भीड़ भरे संसार में
खुद को अकेला सा पाता हूँ
तब कवि मैं बन जाता हूँ

प्यार, विश्वास, नेकी और भलाई
अरे! कहाँ गए ये सारे
चंद पैसों की खातिर जब
हर रिश्ते को मरते पता हूँ
तब कवि मैं बन जाता हूँ

कवि हूँ  मैं

प्यार, विश्वास, नेकी और भलाई
अरे ! कहाँ गए यह सारे
चंद पैसों की खातिर जन,
हर रिश्ते को मरते पता हूँ
तब कवि मैं बन जाता हूँ

कवि हूँ  मैं

जीवन क्या, मरण क्या
मानव जीवन का उद्देश्य क्या
दौलत बड़ी या नेकी बड़ी
इन प्रश्नों में खो जाता हूँ
तब कवि मैं बन जाता हूँ

कवि हूँ  मैं

छल - कपट का घनघोर अँधेरा
लालच और नफरत की आंधी
संसार में जब छा जाती है
तब अपने कलम का प्रकाश फैलता हूँ
तब कवि मैं बन जाता हूँ

कवि हूँ  मैं

अपने जब छोड़ जाते हैं
स्वार्थ का रिश्ता निभाते हैं
ताने भी मुझपर बरसाते हैं
अकेले ही मैं अश्रु बहाता हूँ
तब कवि मैं बन जाता हूँ

कवि हूँ  मैं
जब कोई बच्चा भूख से रोता है
जाड़े में नंगा ही सोता है
इक - इक रोटी के टुकड़े को
कचरे से उठा कर खाता है
आधा मैं वहीं मर जाता हूँ
तब कवि मैं बन जाता हूँ

कवि हूँ  मैं
इस काला बाज़ारी ही बस्ती में 
हर गरीब को बिकता पता हूँ 
भूख बिमारी से तंग आ कर 
जब कोई मौत को गले लगाता है 
तो थोड़ा हैरान मैं हो जाता हूँ 
उसी वक्त मैं कवि बन जाता हूँ

कवि हूँ  मैं
विद्या और ज्ञान के प्रकाश की जगह
नशाखोरी को फैलते पाता हूँ 
हमारा युवा किस ओर जा रहा 
यह देखकर मैं घबराता हूँ 
तब कवि मैं बन जाता हूँ

कवि हूँ  मैं
हिन्दू मुस्लिम और सियासत के मुद्दों पर 
भारत माता को खून में लथपथ पाता हूँ 
आज़ादी आज़ादी सब चिल्लाये थे 
आज उसे कोने में रोते पाता हूँ 
तो मैं कवि बन जाता हूँ 

देखने में खुशहाल देश है मेरा 
खुशहाल देश का वासी हूँ मैं 
ये कहने में शर्माता हूँ 
जब इस गम को छुपा नहीं पता हूँ 
किसी को बतला भी नहीं पता हूँ 

तब कवि मैं बन जाता हूँ
तब कवि मैं बन जाता हूँ

Tuesday, November 1, 2016

नारी है माना तू

नारी है माना तू
पर बलहीन नहीं बलहीन नहीं
क्यों पैदा होते ही तेरे छा जाते गम
क्यों पुत्र सी तू अनमोल नहीं

हाँ माना नारी है तू

शक्ति का अवतार है तू
इस जग की जननी हार है तू
क्यों तेरा ही कोई मोल नहीं

हाँ नारी है तू
क्यों तुच्छ ही समझी जाती तू
क्यों तेरे आदर के संस्कार नहीं


हाँ माना नारी है तू
बच्चो का पालन करती तू
कितनी राते उनके लिए जगती तू
फिर भी तेरा उन पर अधिकार नहीं

हाँ नारी है तू
 मकान को घर है बनाती तू
 हर कोने को सजती है तू
पर क्यों तेरा ही उस पर अधिकार नहीं

हाँ  नारी है तू
उठ जाग ! बहुत देर हुई अब
 पढ़ लिख कर नई राह बना
अपने सपनों  को पूरा कर
और आत्मनिर्भर बन जा