मानव मानव में खुद को कहता
पर मानवता से हीन हूँ
दया धर्म न मुझमे
बस तृष्णा लीन हूँ
मानव मानव में खुद को कहता
गरीब को देखकर हँसता हूँ
लाचार को न ताकत हूँ
हर अमीर से चाहता हूँ दोस्ती
बस अपनी मतलब की बातों में लीन हूँ
मानव मानव में खुद को कहता
किसी की मदद करना नहीं चाहता
किसी की पीड़ा से न उसको वास्ता
हर किसी की बस खुशियों में शरीक हूँ
मानव मानव में खुद को कहता
पशु और मुझमे क्या अंतर रह जाता है
वो भी स्वयं के लिए पसीना बहाता है
उसी की तरह स्वयं में ही लीन हूँ
मानव मानव में खुद को कहता
मानव - मानव को है मारे
लोभ लालच से यह सब है हारे
खून के रिश्ते भी यह है भूले
एक ही सपना पाले है कि मैं अमीर हूँ
मानव मानव में खुद को कहता
आओ ! मानव को हम हैं मानव बनायें
अच्छे गुणों से इसें सजाएँ
हर दिल में हो एक दूजे के लिए प्रेम
सांसों से नहीं, एहसासों से सब सजीव हों
तभी मानव स्वयं को कहे
हाँ मैं हूँ मानव और
मानवता की तस्वीर हूँ
मैं मानवता की तस्वीर हूँ
No comments:
Post a Comment
Please Share Your Thoughts Here